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जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जलहि समाना, यह तथ कहे ग्यानी॥
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय॥
करता रहा सो क्यों किया, अब कर क्यों पछताय।
बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय॥
लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल॥
अब तो जान लिया, राम नाम है सार।
तन छीजे मन उजियारा, यह कबीर विचार॥