साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय॥
मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय॥
भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं, यह दोहा संतोष, संतुलन और करुणा की गहरी भावना को व्यक्त करता है। कवि कहते हैं कि हे प्रभु, मुझे इतना ही दें जितना मेरे परिवार के पालन-पोषण के लिए पर्याप्त हो - न बहुत अधिक, न बहुत कम। मुझे ऐसी स्थिति में रखें कि न तो मैं स्वयं भूखा रहूँ और न ही मेरे द्वार पर आने वाला कोई साधु या अतिथि निराश होकर लौटे। इस प्रार्थना में जीवन का सच्चा आदर्श छिपा है, इतनी संपन्नता कि जीवन सम्मानपूर्वक चल सके, पर इतनी अधिक भी नहीं कि अहंकार जन्म ले या दूसरों का अधिकार छिन जाए। साथ ही इसमें दान, सहानुभूति और परोपकार की भावना है - कि हमारे पास इतना अवश्य हो कि जरूरत पड़ने पर किसी और की मदद कर सकें। यह दोहा मनुष्य को लोभ, अति महत्वाकांक्षा और अनावश्यक संग्रह से दूर रहने का संदेश देते हुए सरल, संतुलित और उदार जीवन जीने की सीख प्रदान करता है।
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