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करता रहा सो क्यों किया, अब कर क्यों पछताय।
बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय॥
लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल॥
अब तो जान लिया, राम नाम है सार।
तन छीजे मन उजियारा, यह कबीर विचार॥
कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ।
जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ॥
करता रहे सो होत है, करता नहीं कुछ आप।
कर का करवा कर लिया, कहे कबीर चित चाप॥
माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ॥
दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ॥
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ॥
बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय|
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय ||
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं।
प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहीं ॥
पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया, लिख लिख भया जू ईंट।
कहें कबीरा प्रेम की, लगी न एको छींट॥
जाति न पूछो साधू की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार को, पडा रहन दो म्यान॥
साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहीं।
धन का भूखा जो फिरै, सो तो साधु नाहीं॥
पढ़े गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसै सूल।
कहै कबीर कासों कहूं, ये ही दुःख का मूल॥
प्रेम न बाडी उपजे, प्रेम न हाट बिकाई।
राजा परजा जेहि रुचे, सीस देहि ले जाई॥
कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर॥